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Wednesday, 12 April 2017

सड़क सुरक्षा

यातायात को नियंत्रित–व्यवस्थित करने के लिए कानून की कमीनहीं है। सड़कों पर तेज गति से भागती हुई लंबी कारें किसी की परवाह किए बिना दौड़ रही हैं। सरकारी और गैर सरकारी सर्वे यहबता रहे हैं कि प्रति वर्ष सड़क दुर्घटना में बढोत्तरी हो रही है। भारत का नाम दुनिया के उन देशों में शामिल है, जिनका सड़क सुरक्षा के मामले में बेहद खराब रिकार्ड है। “देश में प्रत्येक वर्ष पांच लाखसड़क दुर्घटनाएं होती हैं और दुर्घटनाओं के कारण तक़रीबन 1,42,000 लोग दम तोड़ देते हैं, पांच लाख से ज्यादा घायल और कितने ही ज़िन्दगी भर के लिए अपंग। इसका अर्थ है कि हर एक मिनट में एक सड़क दुर्घटना होती है और चार से कम मिनट में दुर्घटना के कारण एक व्यक्ति दम तोड़ देता है। यह बात यही पर नहीं ख़तम हो जाती, दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के परिवार पर जो गुज़रती है उसका कोई हिसाब नहीं है। 

किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना,गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन मेंन चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज केनवधनाढय युवकों का प्रमुख शगल बन गयाहै। विकास के साथ–साथजिस सड़क संस्कृति की जरूरत होतीहै वह हमारे देश में अभी तक नहींबन पाई है।

भारत  में वर्षों से सड़क सुरक्षा पर बहस चलती रही है। फिर भीकुछबेहतर नतीजे निकलकर सामने नहीं आए हैं। आलम यह हैकि रोज–ब–रोज सड़क हादसों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही हैऔर इन्हें लेकर जनता में न तो भय है और न ही घृणा।

इसके लिए कौन दोषी है, फिसलती सड़कें या बढ़ते वाहन? खैर,इतना तोसाफ है कि सड़क पर जिंदगी और मौत के बीच का फर्कमिटता जा रहाहै। हालांकि, हादसों की कुछ ऐसी वजहें हैं, जिन्हेंदूर करने की जरूरत है।सबसे पहली वजह है, चालकों और यात्रियों की लापरवाही। अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों परगौर करें, तो राजमार्गों पर तेज गति से वाहन चलाने, ट्रैफिकसिग्नल की अनदेखी करने, शराब पीकर ड्राइविंग करने और मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए गाड़ी चलाने से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी है। देश में ऐसेबस मालिकों–ड्राइवरों की कमी नहीं है, जो लालची हैं। उनकी प्राथमिकता में बस पैसा कमाना है, न कि यात्रियों की सुरक्षा परध्यान देना। वे व्यस्तम बस रूटोंको रेस–ट्रैक समझते हैं। एक–दूसरे के वाहनों को ओवरटेक करते हैं।गाड़ियों को आपस मेंभिड़ा देते हैं। ऐसे में, उन यात्रियों की जान पर हीबन आती है, जो पैदल सड़क पार कर रहे होते हैं। जाहिर है, इन पर अंकुश लगाने की जरूरत है। इन सभी मामलों में सामाजिक संगठनों, पुलिस–प्रशासन और जनता की भागीदारी बहुत जरूरी है। सड़कयातायातनियमों को मानने के लिए सबको राजी करना एकबड़ी चुनोती है जो हमें स्वीकार्य है।

हम सहयोग के लिए  आग्रह करते हैं की  हमें स्कूलों और जनस्तर में सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए योगदान दें। और जानकारी के लिए या सवाल–जवाब के लिएआप ईमेल या फ़ोन से संपर्ककर सकते है।

Be aware  Be alert  Be safe

साभारित

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